सकोरों में बसा राधाकुंड | डॉ रूपेन्द्र कवि सकोरों में बसा राधाकुंड ...
सकोरों में बसा राधाकुंड
सकोरों में भर दो जल,
यह केवल दया नहीं—
राधा-कृष्ण प्रेम की
मौन आरती है।
जब चिड़ियाँ चोंच डुबोती हैं,
लगता है मानो
श्याम की बाँसुरी का मधुर नाद
यमुना-तट पर उतर आया हो।
उनकी चहक में
वृन्दावन की कुंजों का उल्लास है,
उनका फुदकना जैसे
निधिवन की रास-रज
धीरे-धीरे झूम रही हो।
जल की प्रत्येक बूँद
राधाकुंड-स्नान-सी पावन,
और उसे रखने का भाव
मानो प्रेमानंद के पथ पर
“राधा-नाम रतन” का
एक अगला सोपान हो।
जब तपते गगन तले
कोई नन्हा पंछी
तृप्ति से पंख समेट लेता है,
तब प्रतीत होता है—
करुणा स्वयं
कान्हा के कर-कमलों से
धरती पर उतर आई हो।
आओ,
सकोरों में जल भरें—
कि हर प्यासे कंठ में
भक्ति का मधुर स्वर बहे,
हर चहक में
राधे-श्याम का प्रेम खिले,
और यह छोटा-सा सत्कर्म
धरती पर दया का
एक नया वृन्दावन रच दे।
यह पुण्य-सेवा,
यह निर्मल जल-अर्पण,
राधा-माधव चरणों में
रूपेन्द्र कवि का विनम्र निवेदन हो—
कि जब तक नभ में सूरज दमके,
जब तक यमुना का जल बहे,
तब तक प्रत्येक प्यासे प्राणी में
राधे-कृष्ण का ही दर्शन हो।
✍️ कवि परिचय
डॉ रूपेन्द्र कवि
मानव शास्त्री, उपसचिव लोकभवन
भक्ति, करुणा और भारतीय सांस्कृतिक चेतना से ओतप्रोत रचनाओं के लिए
विशेष रूप से पहचाने जाते हैं। उनकी कविताओं में
राधा-कृष्ण प्रेम, प्रकृति, संवेदना और मानवता
का अत्यंत मधुर संगम दिखाई देता है।
सरल शब्दों में गहन आध्यात्मिक अनुभूति प्रस्तुत करना उनकी लेखनी की विशेषता है।

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