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बोधघाट परियोजना के विरोध में ग्रामीणों का फूटा आक्रोश, 56 गांवों के अस्तित्व पर मंडराया संकट

  "बोधघाट परियोजना के विरोध में ग्रामीणों का फूटा आक्रोश, 56 गांवों के अस्तित्व पर मंडराया संकट" बस्तर में प्रस्तावित बोधघाट परियो...

 


"बोधघाट परियोजना के विरोध में ग्रामीणों का फूटा आक्रोश, 56 गांवों के अस्तित्व पर मंडराया संकट"

बस्तर में प्रस्तावित बोधघाट परियोजना को लेकर एक बार फिर विरोध तेज हो गया है। परियोजना को स्वीकृति मिलने के बाद प्रभावित ग्रामीणों में भारी नाराजगी और चिंता देखने को मिल रही है। ग्रामीणों का कहना है कि वे पीढ़ियों से इस क्षेत्र में निवास कर रहे हैं और अब इस परियोजना के कारण उनके अस्तित्व, संस्कृति और आजीविका पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है।

जगदलपुर  ग्रामीणों के अनुसार प्रस्तावित बोधघाट परियोजना से लगभग 56 गांव, 24 ग्राम पंचायतें तथा करीब 40 हजार की आबादी सीधे प्रभावित होगी। लोगों का आरोप है कि सरकार उनकी सहमति के बिना परियोजना को आगे बढ़ा रही है, जबकि यह केवल जमीन का मुद्दा नहीं बल्कि उनकी पहचान, परंपरा और भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।

परियोजना के विरोध में बड़ी संख्या में ग्रामीण एसडीएम कार्यालय पहुंचे, जहां उन्होंने ज्ञापन सौंपकर बोधघाट परियोजना को तत्काल निरस्त करने की मांग की। ग्रामीणों ने कहा कि वे अब तक शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात प्रशासन और सरकार तक पहुंचाते रहे हैं, लेकिन हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए बयानों के बाद लोगों की चिंता और बढ़ गई है।

ग्रामीणों का कहना है कि सरकार किसी भी कीमत पर परियोजना को लागू करने की बात कर रही है, जबकि प्रभावित क्षेत्र के लोग लगातार इसका विरोध कर रहे हैं। लोगों ने आरोप लगाया कि परियोजना लागू होने की स्थिति में हजारों परिवारों को विस्थापन का सामना करना पड़ेगा और उनकी खेती की जमीन डूब क्षेत्र में चली जाएगी।

स्थानीय ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने कहा कि बोधघाट परियोजना का असर केवल जमीन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे आदिवासी संस्कृति, पारंपरिक जीवनशैली और सामाजिक संरचना पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा। लोगों ने सरकार से मांग की है कि परियोजना पर पुनर्विचार किया जाए और प्रभावित ग्रामीणों की भावनाओं तथा अधिकारों का सम्मान किया जाए।

ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में बड़ा जनआंदोलन किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जल, जंगल और जमीन उनकी पहचान हैं और इन्हें बचाने के लिए वे लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रखेंगे।

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