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दिव्यांगों के परिवहन अधिकार: कानून मजबूत, क्रियान्वयन और मॉनिटरिंग का क्या???

संपादकीय: कानून की बस, हकीकत की सीढ़ी: दिव्यांगों के अधिकारों पर अब जवाबदेही कौन तय करेगा? ...

संपादकीय:

कानून की बस, हकीकत की सीढ़ी: दिव्यांगों के अधिकारों पर अब जवाबदेही कौन तय करेगा?

रैंप, लिफ्ट और accessible बसें सुविधा नहीं, नागरिक अधिकार हैं; असली चुनौती अब कानून बनाने की नहीं, उसके ईमानदार क्रियान्वयन और प्रभावी निगरानी की है।

किसी बस स्टॉप पर व्हीलचेयर उपयोगकर्ता बस का इंतजार कर रहा है। बस आती है, दरवाजा खुलता है, यात्री चढ़ जाते हैं—लेकिन वह व्यक्ति वहीं रह जाता है, क्योंकि बस में उसके लिए चढ़ने का रास्ता नहीं है। बस चली जाती है। यह सिर्फ परिवहन व्यवस्था की कमी नहीं, बल्कि समान नागरिक अधिकारों की परीक्षा है।

भारत का कानून इस सवाल का जवाब बहुत पहले दे चुका है। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 ने accessibility को सरकारी दया या वैकल्पिक सुविधा नहीं माना। अधिनियम की धारा 40 accessibility standards निर्धारित करने की व्यवस्था करती है, जबकि धारा 41 सार्वजनिक परिवहन तक दिव्यांगजनों की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए सरकारों को उपयुक्त कदम उठाने का दायित्व देती है।

कानून की दिशा स्पष्ट है। अब सवाल यह है कि क्या उसका असर सड़क पर चल रही बस तक पहुंचा है?

कानून मजबूत, लेकिन जमीन पर निगरानी कितनी मजबूत?

भारत ने accessibility के लिए कानून बनाए, नियम बनाए, Bus Body Codes में तकनीकी प्रावधान किए और न्यायपालिका ने भी इसे संवैधानिक अधिकार के व्यापक संदर्भ में देखा है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब यह है—इन प्रावधानों के पालन की निगरानी कौन कर रहा है? और यदि कोई परिवहन निगम या बस संचालक accessibility के मानकों का पालन नहीं करता, तो उसके खिलाफ तत्काल और प्रभावी कार्रवाई कितनी सुनिश्चित है?

कानून होना उपलब्धि है, लेकिन कानून का पालन होना शासन की असली परीक्षा है।

दिव्यांग नागरिकों के लिए अधिकारों का वास्तविक अर्थ तभी है जब वे बिना किसी की कृपा, विशेष सिफारिश या अनावश्यक संघर्ष के सार्वजनिक परिवहन का उपयोग कर सकें।

आंकड़े खुद कहानी कहते हैं

2022 में संसद में उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार Association of State Road Transport Undertakings से जुड़े 61 State Transport Undertakings के पास 1,45,747 बसें थीं। इनमें 51,043 बसों में दिव्यांगजनों के boarding और deboarding की सुविधा बताई गई थी।

1,45,747 कुल बसें — 61 State Transport Undertakings
51,043 बसें जिनमें boarding/deboarding सुविधा बताई गई

यानी उपलब्ध आंकड़ों में केवल लगभग एक-तिहाई बसों में ऐसी सुविधा दिखाई देती है। यह आंकड़ा अपने आप में गंभीर सवाल खड़ा करता है—यदि सार्वजनिक परिवहन का इतना बड़ा हिस्सा accessibility की सुविधा से बाहर है, तो उन नागरिकों की स्वतंत्र आवाजाही का क्या होगा जिनके लिए बस सबसे सुलभ और किफायती परिवहन माध्यम है?

इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न है कि देश में accessible buses की वास्तविक स्थिति का एक समेकित, लगातार अपडेट होने वाला राष्ट्रीय डेटाबेस कितना प्रभावी है। जब अधिकार राष्ट्रीय कानून से तय हैं, तो उनकी निगरानी का आंकड़ा बिखरा हुआ क्यों रहे?

रैंप लगा होना ही accessibility नहीं

AIS-153 में wheelchair users के लिए boarding device की अवधारणा में ramp और lift दोनों शामिल हैं। बस की संरचना, wheelchair access, priority seating और reduced mobility वाले यात्रियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए तकनीकी प्रावधान किए गए हैं।

लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण बात है—बस में रैंप लगा होना और रैंप का वास्तव में काम करना, दो अलग बातें हैं।

  • रैंप मौजूद है, लेकिन खुलता नहीं है।
  • व्हीलचेयर लिफ्ट खराब पड़ी है।
  • Wheelchair space सामान या अन्य वस्तुओं से घिरा है।
  • चालक या परिचालक को उपकरण संचालित करने का प्रशिक्षण नहीं है।
  • बस स्टॉप तक पहुंचने का रास्ता ही बाधा-मुक्त नहीं है।

ऐसी स्थिति में कागज पर accessibility मौजूद हो सकती है, लेकिन नागरिक के जीवन में accessibility मौजूद नहीं होती।

नागरिक के लिए कानून फाइल में नहीं, यात्रा के दौरान काम करता है।

“Compliance on Paper” बनाम “Accessibility in Practice”

हमारे प्रशासनिक तंत्र में compliance अक्सर एक प्रमाणपत्र, रिपोर्ट या आंकड़े में बदल जाता है। लेकिन दिव्यांग व्यक्ति के लिए compliance की परीक्षा बेहद सरल है—क्या मैं इस बस में बिना किसी की कृपा के चढ़ सकता हूं?

यदि उसे कई लोगों की मदद मांगनी पड़े, व्हीलचेयर उठानी पड़े, परिचालक से बहस करनी पड़े या अगली बस का इंतजार करना पड़े, तो व्यवस्था ने उसे बराबरी का नागरिक नहीं बनाया।

Accessible transport का अर्थ है कि व्यवस्था व्यक्ति के अनुकूल हो, व्यक्ति को व्यवस्था के अनुकूल होने के लिए मजबूर न किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने भी सवाल को नई ऊंचाई दी

दिव्यांगजनों की accessibility के प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट का Rajive Raturi v. Union of India फैसला विशेष महत्व रखता है। अदालत ने accessibility standards को केवल सलाह या इच्छा तक सीमित रखने के बजाय mandatory और non-negotiable standards की आवश्यकता पर जोर दिया।

इसका सीधा संदेश है कि “हम धीरे-धीरे कर रहे हैं” का तर्क अनिश्चितकाल तक नहीं चल सकता। सरकारों और संस्थाओं को यह बताना होगा कि कितना काम हुआ, कितना बाकी है, किस समय सीमा में पूरा होगा और देरी के लिए जिम्मेदार कौन है।

मॉनिटरिंग सिर्फ निरीक्षण नहीं, जवाबदेही का तंत्र हो

अब accessibility के लिए ऐसा monitoring mechanism जरूरी है जिसमें केवल लक्ष्य न हों, बल्कि मापने योग्य परिणाम और स्पष्ट जिम्मेदारी भी हो।

हर राज्य परिवहन विभाग और परिवहन निगम के लिए सार्वजनिक रूप से यह जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए:

  • कुल बस बेड़ा कितना है?
  • Accessibility standards के अनुरूप कितनी बसें हैं?
  • Operational ramp/lift वाली कितनी बसें हैं?
  • वास्तव में काम कर रही ramp/lift वाली कितनी बसें हैं?
  • Wheelchair space वास्तव में usable कितनी बसों में है?
  • कितने drivers और conductors को accessibility training दी गई है?
  • कितने बस स्टॉप accessible हैं?
  • Accessibility से संबंधित कितनी शिकायतें मिलीं और कितनी हल हुईं?
  • कितनी बसों का स्वतंत्र physical accessibility audit हुआ?
मूल बात

जिस व्यवस्था को नियमित रूप से मापा, जांचा और सार्वजनिक नहीं किया जाता, उसकी जवाबदेही धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाती है। Accessibility के मामले में भी यही सबसे बड़ा खतरा है।

Self-certification से आगे बढ़ने का समय

यदि बस संचालक स्वयं बता दे कि उसकी बस accessible है, तो यह पर्याप्त नहीं होना चाहिए। Accessibility की स्वतंत्र और नियमित जांच होनी चाहिए।

रैंप सिर्फ लगा हुआ है या सही ढंग से खुलता है? लिफ्ट काम करती है? Wheelchair securing mechanism सुरक्षित है? Wheelchair space वास्तव में उपलब्ध है? Driver और conductor को उसका इस्तेमाल करना आता है?

इन सवालों के जवाब केवल फाइलों से नहीं, physical accessibility audit से मिलने चाहिए।

दिव्यांग संगठनों को निगरानी में भागीदार बनाया जाए

accessibility की कमियां अक्सर वही लोग सबसे पहले पहचानते हैं जो उनका प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। इसलिए monitoring system में दिव्यांगजन संगठनों, wheelchair users, दृष्टिबाधित व्यक्तियों और अन्य disability groups की भागीदारी होनी चाहिए।

हर शहर में accessibility social audit की व्यवस्था की जा सकती है। दिव्यांग संगठनों द्वारा की गई रिपोर्ट सार्वजनिक हो, शिकायतों के लिए समयबद्ध grievance mechanism हो और खराब सुविधा के सुधार की अधिकतम समय-सीमा निर्धारित की जाए।

आम नागरिक के लिए भी यह सिर्फ दिव्यांगों का मुद्दा नहीं

Accessibility केवल दिव्यांग नागरिकों की सुविधा नहीं है। बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं, छोटे बच्चों के साथ यात्रा करने वाले माता-पिता, चोटिल यात्री और reduced mobility वाले अनेक लोग इससे लाभान्वित होते हैं।

आज किसी परिवार में wheelchair की जरूरत नहीं है, लेकिन कल दुर्घटना या उम्र के कारण हो सकती है। आज कोई बुजुर्ग सीढ़ियां चढ़ सकता है, कल शायद न चढ़ पाए।

Accessibility किसी एक वर्ग के लिए अतिरिक्त सुविधा नहीं—बेहतर सार्वजनिक परिवहन का न्यूनतम मानक है।

नई बस खरीदना पर्याप्त नहीं, उसे वर्षों तक accessible रखना होगा

PM-eBus Sewa जैसी योजनाओं में accessibility को बस डिजाइन का हिस्सा बनाया गया है। यह स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन नई बस खरीद लेना अंतिम समाधान नहीं है।

असली प्रश्न यह है—क्या वह बस पांच वर्ष बाद भी accessible रहेगी? क्या उसका ramp काम करेगा? क्या lift का maintenance होगा? क्या replacement parts उपलब्ध होंगे? क्या चालक और परिचालक को समय-समय पर प्रशिक्षण मिलेगा?

इसलिए accessibility को केवल capital expenditure नहीं, बल्कि continuous public service obligation समझना होगा।

“Accessible India” को “Audited India” भी बनाना होगा

भारत में accessibility को लेकर कानून, नीतियां और guidelines मौजूद हैं। अब जरूरत अगले चरण की है।

एक प्रभावी निगरानी चक्र

मानक → क्रियान्वयन → निरीक्षण → शिकायत → सुधार → पुनः निरीक्षण

यह पूरा चक्र डिजिटल, पारदर्शी और नागरिकों के लिए सार्वजनिक होना चाहिए।

हर राज्य का accessibility dashboard हो। हर परिवहन निगम का scorecard हो। हर शहर के बस स्टॉप की accessibility स्थिति सार्वजनिक हो। हर शिकायत का tracking number हो, ताकि नागरिक देख सके कि शिकायत किस अधिकारी के पास गई, क्या कार्रवाई हुई और कब तक समाधान हुआ।

अधिकार का मूल्य तभी है जब उसे लागू कराने का रास्ता भी हो

भारत में दिव्यांगजनों के अधिकारों का कानूनी ढांचा आज पहले से कहीं अधिक मजबूत है। RPwD Act ने अधिकारों की नींव रखी, Bus Body Codes ने तकनीकी मानक दिए और न्यायपालिका ने accessibility के संवैधानिक महत्व को रेखांकित किया।

अब कमी वहां है जहां कानून और नागरिक के बीच प्रशासन खड़ा है।

आखिरी सवाल बस का नहीं, व्यवस्था का है

कानून किताब में मजबूत है। अब व्यवस्था को जमीन पर भी उतना ही मजबूत होना होगा।

सरकारें केवल यह न बताएं कि कितनी accessible बसें खरीदी गईं। उन्हें यह भी बताना चाहिए—कितनी बसों के रैंप आज काम कर रहे हैं, कितने दिव्यांग यात्री वास्तव में स्वतंत्र रूप से यात्रा कर पा रहे हैं और जब व्यवस्था विफल होती है, तो जवाबदेह कौन है?

रैंप बस पर लगा लोहे का ढांचा नहीं—यह समान नागरिकता के दरवाजे तक पहुंचने का रास्ता है।

तथ्य एवं संदर्भ:
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016; Rights of Persons with Disabilities Rules; AIS-153 Bus Body Code; सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के प्रावधान; संसद में उपलब्ध कराए गए सरकारी आंकड़े; तथा सुप्रीम कोर्ट का Rajive Raturi v. Union of India निर्णय।

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