चारे और जगह की कमी से बढ़ी समस्या, लोग सड़कों पर छोड़ रहे मवेशी: रायपुर : प्रदेश में घरेलू पशुओं की गणना जारी है, जो 31 मार्च तक पूरी हो ज...
चारे और जगह की कमी से बढ़ी समस्या, लोग सड़कों पर छोड़ रहे मवेशी:
रायपुर : प्रदेश में घरेलू पशुओं की गणना जारी है, जो 31 मार्च तक पूरी हो जाएगी। शुरुआती आंकड़ों से संकेत मिल रहे हैं कि गायों की संख्या में गिरावट हो सकती है, जबकि बकरे-बकरियों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। चिंताजनक बात यह है कि गधे विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस गिरावट के पीछे चारे और पशुओं के रखरखाव की बढ़ती लागत मुख्य वजह है। पशुपालकों के लिए खर्च बढ़ गया है, जबकि आय स्थिर या कम हो रही है। साथ ही, चरने के लिए पर्याप्त स्थान न होने के कारण लोग मवेशियों को खुले में छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।
आर्थिक बोझ बढ़ा, जगह की किल्लत बनी चुनौती:
पशुपालकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगा होता चारा और जगह की कमी है। शहरीकरण और खेती योग्य भूमि के घटने से पशुओं के लिए चरागाह कम हो गए हैं। इसके चलते कई लोग गाय-बैल और अन्य मवेशियों को पालने में असमर्थ हो रहे हैं।
गांवों में भी यह समस्या बढ़ रही है। चारे की ऊंची कीमतों और चिकित्सा खर्चों के कारण पशुपालक अपने जानवरों को छोड़ने पर मजबूर हैं। यही कारण है कि सड़कों और सार्वजनिक स्थलों पर आवारा मवेशियों की संख्या बढ़ रही है, जिससे यातायात और सुरक्षा संबंधी दिक्कतें भी बढ़ रही हैं।
गधों की घटती संख्या चिंता का विषय:
गणना के प्रारंभिक आंकड़ों के मुताबिक, गधों की संख्या में भारी गिरावट देखी गई है। कृषि और परिवहन क्षेत्र में मशीनों के बढ़ते उपयोग के कारण इनका पारंपरिक उपयोग घट गया है। नतीजतन, गधे अब लगभग विलुप्त होने की कगार पर हैं।
समाधान क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि पशुपालन के लिए सरकारी सहायता योजनाओं को और मजबूत किया जाना चाहिए। चारा सब्सिडी, चरागाहों का विकास और पशुओं की देखभाल के लिए सुविधाएं बढ़ाने की जरूरत है। साथ ही, आवारा पशुओं की समस्या से निपटने के लिए प्रभावी नीतियां बनानी होंगी, ताकि न केवल पशुपालकों को राहत मिले, बल्कि सड़कों पर घूम रहे मवेशियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सके।
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