"पंडवानी की अमर स्वर-सरिता थम गई: पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन, लोककला जगत को अपूरणीय क्षति" रायपुर/जगदलपुर, 05 जुलाई 2026। छत्ती...
"पंडवानी की अमर स्वर-सरिता थम गई: पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन, लोककला जगत को अपूरणीय क्षति"
रायपुर/जगदलपुर, 05 जुलाई 2026। छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को विश्व पटल पर नई पहचान दिलाने वाली प्रख्यात पंडवानी गायिका, पद्म विभूषण तीजन बाई का शनिवार देर रात रायपुर स्थित अस्पताल में निधन हो गया। वे 69 वर्ष की थीं। पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं। उनके निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कला, साहित्य और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। उनके जाने से भारतीय लोककला का एक ऐसा युग समाप्त हो गया, जिसकी भरपाई संभव नहीं है।
तीजन बाई ने अपने सशक्त स्वर, अद्भुत अभिनय, प्रभावशाली संवाद शैली और पंडवानी की कापालिक शैली को नई ऊँचाइयों तक पहुंचाया। उन्होंने महाभारत की कथाओं को केवल गाया ही नहीं, बल्कि अपने अभिनय से जीवंत कर दिया। यही कारण रहा कि गांव की चौपालों से निकलकर उनकी कला विश्व के बड़े-बड़े मंचों तक पहुँची और छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।
"गरीबी और संघर्ष से शुरू हुआ सफर"
8 अगस्त 1956 को तत्कालीन बिलासपुर (वर्तमान गौरेला-पेंड्रा-मरवाही क्षेत्र से जुड़े सांस्कृतिक परिवेश) के एक साधारण परिवार में जन्मी तीजन बाई का बचपन आर्थिक कठिनाइयों में बीता। बचपन में वे अपने नाना से महाभारत की कथाएँ सुनती थीं। इन्हीं कथाओं ने उनके भीतर पंडवानी गायन के प्रति गहरी रुचि पैदा की।
उस समय महिलाओं का सार्वजनिक मंचों पर पंडवानी प्रस्तुत करना सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं माना जाता था। विरोध, तिरस्कार और सामाजिक बहिष्कार जैसी कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए भी उन्होंने हार नहीं मानी। अपने अदम्य साहस और अथक साधना के बल पर उन्होंने स्वयं को स्थापित किया और आगे चलकर दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित लोक कलाकारों में शामिल हो गईं।
"13 वर्ष की उम्र में पहली प्रस्तुति"
महज 13 वर्ष की आयु में उन्होंने पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी। इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी बुलंद आवाज, प्रभावशाली अभिनय और मंच संचालन ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। धीरे-धीरे वे देशभर में प्रसिद्ध हो गईं और फिर विदेशों तक भारतीय लोकसंस्कृति का प्रतिनिधित्व करने लगीं।
"विश्व मंच पर छत्तीसगढ़ की पहचान"
तीजन बाई ने अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा सहित अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुतियाँ देकर भारतीय लोककला का परचम लहराया। उन्होंने अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक समारोहों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उनकी कला ने यह सिद्ध कर दिया कि लोक परंपराएँ भी विश्व स्तर पर सम्मान प्राप्त कर सकती हैं।
"सम्मानों से सजा गौरवशाली सफर"
लोककला में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया—
पद्मश्री (1988)
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1992)
पद्म भूषण (2003)
छत्तीसगढ़ रत्न (2018)
पद्म विभूषण (2019) – भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान
कबीर सम्मान (2022)
इसके अलावा उन्हें देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थाओं और कला मंचों द्वारा सम्मानित किया गया।
"नई पीढ़ी के लिए बनीं प्रेरणा"
तीजन बाई केवल एक कलाकार नहीं थीं, बल्कि लोकसंस्कृति की जीवंत पाठशाला थीं। उन्होंने अनेक युवा कलाकारों को पंडवानी की बारीकियाँ सिखाईं और इस प्राचीन लोककला को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उनका मानना था कि संस्कृति तभी जीवित रहती है जब नई पीढ़ी उसे अपनाती है।
"देशभर में शोक की लहर"
उनके निधन पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों, कलाकारों, साहित्यकारों और सांस्कृतिक संस्थाओं ने गहरा शोक व्यक्त किया। सभी ने उन्हें भारतीय लोककला की महान साधिका बताते हुए उनके योगदान को अविस्मरणीय बताया।
"कला अमर रहेगी, स्वर सदैव गूंजता रहेगा"
तीजन बाई भले ही आज हमारे बीच नहीं रहीं, लेकिन उनकी आवाज, उनकी अभिनय शैली और पंडवानी की अमर परंपरा सदियों तक लोगों के दिलों में जीवित रहेगी। उन्होंने यह सिद्ध किया कि समर्पण, संघर्ष और प्रतिभा के बल पर कोई भी कलाकार पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना सकता है।
छत्तीसगढ़ की इस महान लोकगायिका को भावभीनी श्रद्धांजलि।


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