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विश्व सामाजिक कार्य दिवस 2026: छत्तीसगढ़ से उभरती आशा, सद्भाव और सहभागिता की कहानियाँ

विश्व सामाजिक कार्य दिवस 2026: छत्तीसगढ़ से उभरती आशा, सद्भाव और सहभागिता की कहानियाँ विश्व सामाजिक कार्य दिवस 2026: छत्तीसगढ़ स...

विश्व सामाजिक कार्य दिवस 2026: छत्तीसगढ़ से उभरती आशा, सद्भाव और सहभागिता की कहानियाँ

विश्व सामाजिक कार्य दिवस 2026: छत्तीसगढ़ से उभरती आशा, सद्भाव और सहभागिता की कहानियाँ

लेखक: डॉ. रूपेन्द्र कवि

विश्व सामाजिक कार्य दिवस केवल एक औपचारिक अवसर नहीं, बल्कि समाज के उन मौन प्रयासों को पहचान देने का दिन है, जो जमीनी स्तर पर परिवर्तन की धारा को आगे बढ़ाते हैं। वर्ष 2026 की थीम “आशा और सद्भाव का संयुक्त निर्माण” विशेष रूप से छत्तीसगढ़ जैसे बहु-सांस्कृतिक और जनजातीय बहुल प्रदेश के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है।

छत्तीसगढ़ का सामाजिक परिदृश्य विविधताओं से भरा हुआ है, जिसमें बस्तर जैसे अंचल अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, सामुदायिक जीवनशैली और प्रकृति-आधारित ज्ञान प्रणालियों के लिए विशेष पहचान रखते हैं। यहाँ सामाजिक कार्य का अर्थ केवल सहायता प्रदान करना नहीं, बल्कि समुदाय के साथ संवाद स्थापित करना, उनके ज्ञान और परंपराओं का सम्मान करना, तथा सहभागिता के माध्यम से विकास के मार्ग तलाशना है।

एक मानवविज्ञानी (Anthropologist) के रूप में मेरे अनुभव यह बताते हैं कि जनजातीय समाज में “साझा जीवन” (collective living) की अवधारणा आज भी जीवंत है।

यहाँ ‘हम’ की भावना ‘मैं’ से अधिक प्रबल है, जो सामाजिक संतुलन और सामूहिक निर्णयों को मजबूत बनाती है।

हमारे व्यक्तिगत स्तर पर, एक दंपति के रूप में किए गए सामाजिक और परोपकारी कार्यों के दौरान यह अनुभव हुआ कि वास्तविक परिवर्तन तभी संभव है जब हम “समाधान देने वाले” नहीं, बल्कि “साथ चलने वाले” बनें। शिक्षा, स्वास्थ्य जागरूकता, पोषण, और महिलाओं की सहभागिता जैसे क्षेत्रों में छोटे-छोटे प्रयासों ने सकारात्मक बदलाव की दिशा दिखाई है।

छत्तीसगढ़ में पोषण, शिक्षा और आजीविका के क्षेत्र में कई सकारात्मक पहलें देखने को मिलती हैं। आंगनबाड़ी सेवाओं का विस्तार, स्व-सहायता समूहों की बढ़ती भागीदारी, तथा स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों ने समुदायों को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साथ ही, दूरस्थ क्षेत्रों में भौगोलिक चुनौतियाँ अब भी मौजूद हैं, जिनसे निपटने के लिए निरंतर संवाद, विश्वास और सहभागिता की आवश्यकता बनी हुई है।

साहित्यकार (Literature) के रूप में यह भी अनुभव होता है कि समाज की वास्तविक कहानियाँ—संघर्ष, सहयोग और संवेदनाओं से भरी—हमारी सोच को व्यापक बनाती हैं। छत्तीसगढ़ की लोकपरंपराएँ, गीत और कथाएँ न केवल सांस्कृतिक धरोहर हैं, बल्कि सामाजिक समरसता और सामूहिकता के जीवंत उदाहरण भी हैं।

विश्व सामाजिक कार्य दिवस हमें यह अवसर देता है कि हम इन अनुभवों को साझा करें और यह समझें कि विकास केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों, विश्वास और सहभागिता से मापा जाता है। “आशा” तब जन्म लेती है जब समुदाय स्वयं अपने विकास में भागीदार बनता है, और “सद्भाव” तब स्थापित होता है जब विविधताओं को स्वीकार कर एकता का मार्ग चुना जाता है।

आज आवश्यकता है कि हम सभी—चाहे किसी भी क्षेत्र से जुड़े हों—समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें और संवेदनशील दृष्टिकोण के साथ कार्य करें। छोटे-छोटे प्रयास, स्थानीय स्तर पर किए गए संवाद और पारस्परिक विश्वास ही एक सशक्त, समावेशी और संतुलित समाज की नींव रख सकते हैं।

Author

डॉ. रूपेन्द्र कवि

एंथ्रोपोलॉजिस्ट | साहित्यकार | परोपकारी

अस्वीकरण: यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों एवं अनुभवों पर आधारित एक सहभागितापूर्ण अध्ययन (participatory study) है। इसका उद्देश्य सामाजिक परिप्रेक्ष्य को साझा करना है, न कि किसी नीतिगत या प्रशासनिक मत का प्रतिनिधित्व करना।

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