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बलिदान की अमर चेतना: चंद्रशेखर आज़ाद और हमारा राष्ट्रीय दायित्व

बलिदान की अमर चेतना और हमारा दायित्व विशेष लेख | 27 फ़रवरी स्मरण 27 फ़रवरी 1931 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ...

बलिदान की अमर चेतना और हमारा दायित्व
विशेष लेख | 27 फ़रवरी स्मरण

27 फ़रवरी 1931 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अदम्य साहस और आत्मसम्मान का अमर दिवस है। इसी दिन क्रांतिकारी वीर चंद्रशेखर आज़ाद ने इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क (वर्तमान चंद्रशेखर आज़ाद पार्क) में अपने प्राणों का उत्सर्ग कर यह स्पष्ट कर दिया कि उनके लिए स्वतंत्रता जीवन से भी अधिक मूल्यवान थी। उनका बलिदान मात्र एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान और स्वाधीनता चेतना का शाश्वत प्रतीक है।

किशोरावस्था से ही आज़ाद ने पराधीनता के विरुद्ध संघर्ष का मार्ग अपनाया। असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी से लेकर क्रांतिकारी संगठन के दृढ़ नेतृत्व तक, उन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन को राष्ट्रहित में समर्पित कर दिया। न्यायालय में स्वयं को “आज़ाद” कहकर परिचित कराना उनके अटूट संकल्प, निर्भीकता और स्वाभिमान का जीवंत उदाहरण था। यह नाम उनके व्यक्तित्व का पर्याय बन गया—एक ऐसा व्यक्तित्व जो किसी भी बंधन को स्वीकार नहीं करता।

आज़ाद का जीवन हमें यह गहन संदेश देता है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन का विषय नहीं है, बल्कि नागरिक चेतना, समान अवसर, सामाजिक न्याय और नैतिक उत्तरदायित्व की सतत साधना है। वर्तमान समय में जब भारत विकास, तकनीकी प्रगति और वैश्विक प्रतिष्ठा की नई ऊँचाइयों को स्पर्श कर रहा है, तब यह और भी आवश्यक हो जाता है कि संवैधानिक मूल्यों, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता के प्रति हमारी प्रतिबद्धता और अधिक सुदृढ़ हो।

समकालीन परिप्रेक्ष्य में युवाओं के लिए चंद्रशेखर आज़ाद का जीवन आदर्श विशेष रूप से प्रेरणादायक है। उन्होंने केवल साहस ही नहीं, बल्कि अनुशासन, संगठन और लक्ष्यनिष्ठा को भी समान महत्व दिया। यदि आज की युवा शक्ति अपनी ऊर्जा को शिक्षा, नवाचार, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्र निर्माण की सकारात्मक दिशा में समर्पित करे, तो वही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

आज़ाद ने अपने अंतिम क्षण तक आत्मसमर्पण स्वीकार नहीं किया। यह निर्णय स्वतंत्रता के प्रति उनकी अटूट आस्था, आत्मसम्मान और अदम्य साहस की पराकाष्ठा का प्रतीक है। उनका जीवन संदेश देता है कि स्वाधीनता की रक्षा निरंतर सजगता, नैतिक दृढ़ता और सामूहिक प्रयास से ही संभव है।

उनके बलिदान दिवस पर यह हमारा नैतिक दायित्व है कि हम अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करें, सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को प्राथमिकता दें तथा राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव को सुदृढ़ बनाने का संकल्प लें। यही उनके आदर्शों को जीवंत रखने का वास्तविक मार्ग है।

लेखक: डॉ. रूपेन्द्र कवि
मानवशास्त्री, साहित्यकार, परोपकारी
उप सचिव, राज्यपाल सचिवालय, छत्तीसगढ़

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