पिपरहवा अवशेषों की अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी: भारत की बौद्ध सभ्यता का वैश्विक पुनर्पाठ 📍 नई दिल्ली 🗓️ 1 जनव...
पिपरहवा अवशेषों की अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी: भारत की बौद्ध सभ्यता का वैश्विक पुनर्पाठ
भारत की सभ्यतागत स्मृति और उसकी बौद्ध विरासत को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करते हुए, यह प्रदर्शनी राय पिथौरा सांस्कृतिक परिसर, नई दिल्ली में आयोजित की जा रही है। यह आयोजन न केवल ऐतिहासिक अवशेषों का प्रदर्शन है, बल्कि भारत की उस सतत आध्यात्मिक परंपरा का सजीव प्रमाण भी है जिसने विश्व को करुणा, अहिंसा और प्रज्ञा का मार्ग दिखाया।
वर्ष 1898 में खोजे गए पिपरहवा अवशेष प्रारंभिक बौद्ध धर्म के पुरातात्विक अध्ययन में केंद्रीय स्थान रखते हैं। विद्वानों के अनुसार, ये अवशेष भगवान बुद्ध से सीधे जुड़े सबसे प्राचीन और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण साक्ष्यों में शामिल हैं। पुरातात्विक प्रमाण इन्हें प्राचीन कपिलवस्तु से जोड़ते हैं, जहाँ राजकुमार सिद्धार्थ ने संन्यास से पूर्व अपना जीवन व्यतीत किया।
स्वदेश वापसी और सांस्कृतिक पुनर्प्राप्ति
इस प्रदर्शनी की ऐतिहासिक विशेषता यह है कि एक सदी से भी अधिक समय बाद स्वदेश लौटाए गए पवित्र अवशेषों को पहली बार राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली और भारतीय संग्रहालय, कोलकाता में संरक्षित पुरातात्विक धरोहरों के साथ एक मंच पर प्रस्तुत किया गया है। यह प्रयास भारत की सांस्कृतिक संपदा की पुनर्प्राप्ति के लिए चल रहे निरंतर संस्थागत और कूटनीतिक प्रयासों का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
आधुनिक प्रस्तुति, प्राचीन संदेश
प्रदर्शनी को विषयगत रूप से इस प्रकार संयोजित किया गया है कि दर्शक बुद्ध के जीवन, उनकी शिक्षाओं और बौद्ध कला के वैश्विक विस्तार को एक क्रमबद्ध अनुभव के रूप में समझ सकें। सांची स्तूप से प्रेरित केंद्रीय मॉडल, इमर्सिव फिल्में, डिजिटल रिकंस्ट्रक्शन और मल्टीमीडिया प्रस्तुतियाँ इसे एक जीवंत सांस्कृतिक संवाद में परिवर्तित करती हैं।



कोई टिप्पणी नहीं