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नल से आगे: भारत की जल क्रांति के पाँच सूत्र जो शासन की परिभाषा बदल रहे हैं
भारत की सार्वजनिक नीतियों को लेकर एक पुरानी धारणा रही है कि सफलता को प्रायः दृश्य अवसंरचना तक सीमित कर दिया जाता है। लेकिन विकास का इतिहास बताता है कि अवसंरचना समाधान नहीं, केवल शुरुआत होती है।
ग्रामीण पेयजल व्यवस्था में उभरता नया दृष्टिकोण इस सोच को चुनौती देता है। जल जीवन मिशन अब नल लगाने से आगे बढ़कर सतत, सुरक्षित और विश्वसनीय जल सेवा पर केंद्रित हो चुका है।
नल से आगे: भारत की जल नीति में खामोश लेकिन निर्णायक मोड़
भारत की ग्रामीण पेयजल नीति एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहाँ सवाल अब नल लगाने का नहीं, बल्कि पानी चलने का है। वर्षों तक सरकारी सफलता का पैमाना दृश्य अवसंरचना रहा, लेकिन जल जीवन मिशन के साथ यह सोच बदल रही है।
‘जल सेवा आंकलन’ के माध्यम से सरकार ने पहली बार यह स्वीकार किया है कि सार्वजनिक नीति की असली कसौटी सेवा की गुणवत्ता, निरंतरता और स्थानीय स्वामित्व है—न कि केवल लक्ष्यपूर्ति के आंकड़े।
यह पहल गांवों को केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि मूल्यांकनकर्ता और संरक्षक बनाती है। ग्राम सभा, सार्वजनिक डैशबोर्ड और नागरिक प्रतिक्रिया के ज़रिये जवाबदेही का एक नया लोकतांत्रिक चक्र खड़ा किया गया है।
26 जनवरी 2026 तक हर ‘हर घर जल’ पंचायत के आत्म-मूल्यांकन का लक्ष्य स्पष्ट संकेत देता है—
राज्य अब प्रदाता नहीं, सक्षमकर्ता बनना चाहता है।
प्रश्न यह नहीं कि यह मॉडल काम करेगा या नहीं;
प्रश्न यह है कि क्या यही मॉडल भारत के बाकी ग्रामीण शासन का भविष्य बनेगा?
अवसंरचना से आगे: सतत सेवा की अवधारणा
सफलता का पैमाना अब नलों की संख्या नहीं, बल्कि जल की गुणवत्ता, नियमितता और स्रोत की स्थिरता है।
गांव द्वारा स्वयं का ऑडिट
जल सेवा आंकलन सरकारी निरीक्षण नहीं, बल्कि समुदाय-नेतृत्व वाली आत्म-समीक्षा है—जो लोकतांत्रिक शासन की बुनियाद को मजबूत करती है।
जनभागीदारी: स्थायित्व की कुंजी
यह मिशन इस विचार को पुष्ट करता है कि जल योजना सरकार की नहीं, समुदाय की जिम्मेदारी है।
वॉटर रिपोर्ट कार्ड और जवाबदेही
ग्राम सभा अनुमोदन से लेकर सार्वजनिक डैशबोर्ड तक—यह प्रक्रिया पारदर्शिता को कार्रवाई में बदल देती है।
26 जनवरी 2026: एक नीतिगत संकेत
यह समय-सीमा प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामुदायिक स्वामित्व को संस्थागत करने का संकेत है।
एक योजना नहीं, शासन की नई भाषा
जल सेवा आंकलन केवल एक डिजिटल टूल नहीं, बल्कि शासन के उस नए मॉडल का संकेत है जहाँ प्रौद्योगिकी के माध्यम से सत्ता समुदाय को सौंपी जाती है।


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