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छत्तीसगढ़ की आबकारी नीति: सरकारी बनाम ठेका—एक चौंकाने वाला सच

छत्तीसगढ़ की आबकारी नीति: सरकारी बनाम ठेका—एक चौंकाने वाला सच छत्तीसगढ़ की सड़कों पर शराब की दुकानें एक आम दृश्य हैं, ...



छत्तीसगढ़ की आबकारी नीति: सरकारी बनाम ठेका—एक चौंकाने वाला सच

छत्तीसगढ़ की सड़कों पर शराब की दुकानें एक आम दृश्य हैं, लेकिन क्या हमने कभी यह ठहरकर सोचा है कि इन दुकानों का संचालन कौन और कैसे करता है—और इसका असर राज्य के खजाने, सार्वजनिक स्वास्थ्य और प्रशासनिक पारदर्शिता पर कितना गहरा पड़ता है?

आबकारी नीति पर बहस अक्सर दो ध्रुवों में सिमट जाती है—सरकारी नियंत्रण बनाम निजी ठेका प्रणाली। लोकप्रिय धारणा यह है कि सरकारी दुकानें अधिक सुरक्षित और जिम्मेदार होती हैं। लेकिन तथ्य इस सहज निष्कर्ष को चुनौती देते हैं।

राजस्व का आश्चर्य: सरकार के लिए ‘ठेका’ क्यों अधिक भरोसेमंद

यह सुनने में भले ही उल्टा लगे, लेकिन निजी ठेका मॉडल राज्य के लिए अधिक स्थिर और पूर्वानुमेय राजस्व सुनिश्चित करता है। आबकारी से प्राप्त आय राज्य के अपने कर राजस्व का लगभग पाँचवाँ हिस्सा है—यानी यह बजट का केंद्रीय स्तंभ है।

ठेका मॉडल में सरकार प्रतिस्पर्धी बोली और लाइसेंस शुल्क के माध्यम से अपनी आय पहले ही सुरक्षित कर लेती है—बिक्री के जोखिम निजी ऑपरेटर पर स्थानांतरित हो जाते हैं।

इसके विपरीत, सरकारी मॉडल में संचालन, लॉजिस्टिक्स और मानव संसाधन का पूरा बोझ राज्य पर आता है। राजस्व के साथ जोखिम भी सरकार ही उठाती है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य का सच: अधिक पहुँच, कम अवैध शराब

अवैध और जहरीली शराब की समस्या का मूल कारण केवल दुकान का स्वामित्व नहीं, बल्कि वैध शराब की उपलब्धता है। जब सरकारी दुकानें दूर होती हैं या समयबद्ध रहती हैं, तो खालीपन पैदा होता है।

“अवैध शराब का सबसे बड़ा सहयोगी सरकारी नियंत्रण में कमी नहीं, बल्कि वैध आपूर्ति में पैदा हुआ खालीपन होता है।”

लाइसेंस प्राप्त निजी दुकानों का सघन नेटवर्क इस खालीपन को भर सकता है और स्वाभाविक रूप से अवैध शराब की मांग को कम कर सकता है।

दक्षता और जवाबदेही: जोखिम कौन बेहतर संभालता है

ठेका प्रणाली में निजी ऑपरेटर का आर्थिक हित सीधे प्रदर्शन से जुड़ा होता है। सरकार कठोर अनुबंध शर्तों, तकनीकी निगरानी और दंडात्मक प्रावधानों से जवाबदेही सुनिश्चित कर सकती है।

  • QR कोड आधारित ट्रेसबिलिटी
  • GST-अनुरूप ई-बिलिंग
  • होलोग्राफिक सुरक्षा स्टिकर

बचेली प्रकरण और आबकारी नीति की असहज सच्चाई

शासकीय बनाम ठेका प्रणाली—तुलनात्मक अध्ययन की कसौटी पर एक ताज़ा मामला

हाल ही में दंतेवाड़ा के बचेली की शासकीय शराब दुकान से जुड़े गबन प्रकरण ने छत्तीसगढ़ की आबकारी नीति पर चल रही बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है। यह घटना केवल एक स्थानीय वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि उस संरचनात्मक कमजोरी की ओर संकेत करती है, जिसकी ओर शासकीय दुकान मॉडल के संदर्भ में पहले ही चेतावनी दी जा चुकी है।

एक घटना नहीं, एक संकेत

प्राथमिक जांच में सामने आया कि बिक्री की राशि का एक हिस्सा सरकारी खातों में जमा होने के बजाय निजी माध्यमों से प्रवाहित किया गया। इससे यह धारणा टूटती है कि सरकारी स्वामित्व अपने-आप में पारदर्शिता की गारंटी है।

प्रश्न किसी एक व्यक्ति की नैतिक विफलता का नहीं, बल्कि उस प्रणाली का है जहाँ नियंत्रण काग़ज़ी है और जवाबदेही बिखरी हुई।

शासकीय मॉडल की अंतर्निहित कमजोरियाँ

  • जवाबदेही का फैलाव: “सब जिम्मेदार—इसलिए कोई जिम्मेदार नहीं।”
  • निगरानी का भ्रम: ऑडिट/सिस्टम हैं, पर रियल-टाइम उत्तरदायित्व नहीं।
  • प्रोत्साहन का अभाव: लाभ-हानि से सीधा सरोकार न होने पर सतर्कता घटती है।
  • सिस्टम-आधारित भ्रष्टाचार: ढीली प्रक्रियाएँ अवसर बन जाती हैं।

ठेका प्रणाली: तुलनात्मक मजबूती

ठेका मॉडल में स्पष्ट जिम्मेदारी तय होती थी। सुरक्षा राशि, राजस्व लक्ष्य और अनुबंधीय दंड—ये सभी राज्य के जोखिम को सीमित करते और गड़बड़ी पर त्वरित कार्रवाई संभव बनाते थे।

नीति-निर्माताओं के लिए सबक

  • राज्य का कार्य व्यवसाय चलाना है या नियमन करना?
  • प्रशासनिक विस्तार से राजस्व सुरक्षा बढ़ी या जोखिम?
  • दोष व्यक्ति का है या नीति-डिज़ाइन का?
आबकारी नीति का मूल्यांकन वैचारिक आग्रह से नहीं, व्यावहारिक परिणामों से होना चाहिए। सुधरे हुए, कड़े नियमन वाले ठेका मॉडल में आज भी पारदर्शिता, जवाबदेही और राजस्व सुरक्षा की बेहतर संभावना दिखती है।

असली सवाल ‘कौन’ नहीं, ‘कैसे’ है

सरकारी बनाम निजी की बहस अपने आप में अधूरी है। असली प्रश्न यह है कि व्यवस्था कितनी पारदर्शी, अनुशासित और तकनीक-सक्षम है।

बिना पारदर्शी बोली, रीयल-टाइम निगरानी और सामाजिक प्रतिबंधों के कोई भी मॉडल विफल होने के लिए अभिशप्त है।

राजस्व की स्थिरता, अवैध शराब पर प्रभावी नियंत्रण और परिचालन दक्षता—ये तीनों तर्क एक सख्ती से विनियमित ठेका प्रणाली के पक्ष में जाते हैं। छत्तीसगढ़ के लिए यह केवल नीति नहीं, बल्कि शासन की परिपक्वता की परीक्षा है।

शुभांशु झा

प्रधान संपादक, 4thcolumn.in

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