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बस्तर पंडुम पर आदिवासी समाज का विरोध, सरकार पर रीति-रिवाजों से छेड़छाड़ का आरोप

  बस्तर पंडुम पर आदिवासी समाज का विरोध, सरकार पर रीति-रिवाजों से छेड़छाड़ का आरोप: बस्तर: छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा आदिवासी संस्कृति के प्रचार-...

 बस्तर पंडुम पर आदिवासी समाज का विरोध, सरकार पर रीति-रिवाजों से छेड़छाड़ का आरोप:

बस्तर: छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा आदिवासी संस्कृति के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से आयोजित बस्तर पंडुम विवादों में घिर गया है। सरकार इसे सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने और परंपराओं को बढ़ावा देने का माध्यम बता रही है, लेकिन सर्व आदिवासी समाज ने इसका कड़ा विरोध किया है। आदिवासी समाज का आरोप है कि यह आयोजन परंपराओं से छेड़छाड़ और आस्था के साथ खिलवाड़ है।

आदिवासी समाज ने जताई नाराजगी

सर्व आदिवासी समाज ने बस्तर संभाग आयुक्त को ज्ञापन सौंपकर इस सरकारी आयोजन पर आपत्ति जताई है। समाज के अनुसार, बस्तर पंडुम की अवधारणा को बिना समुदाय की सहमति के लागू किया गया है, जिससे पारंपरिक मान्यताओं को ठेस पहुंच रही है।


सर्व आदिवासी समाज के संभागीय अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने कहा,

"आदिवासी समाज में पंडुम का विशेष महत्व है। यह हर ऋतु के अनुसार पारंपरिक विधि से मनाया जाता है, जिसमें गांव के देवी-देवताओं की पूजा आवश्यक होती है। लेकिन सरकार ने बिना किसी राय-मशविरा के इसे एक प्रतियोगिता में बदल दिया है।"


'सरकार का पंडुम, समाज का नहीं'

गोंडवाना समाज के सदस्य सुकलाल नेताम ने सरकार के इस फैसले पर नाराजगी जताते हुए कहा,

"बस्तर पंडुम का नाम आदिवासी इतिहास में दर्ज नहीं है। इसे समाज की सहमति के बिना गढ़ा गया है। गांव के पारंपरिक प्रमुखों, जैसे गायता और पटेल, से राय लिए बिना इसे लागू किया गया। इसके अलावा, समाज के पदाधिकारियों को भी इस आयोजन में शामिल नहीं किया गया है। यह केवल एक प्रतियोगिता बनकर रह गया है, जिसे आदिवासी समाज स्वीकार नहीं करता।"


सरकार की योजना क्या है?

सरकार का दावा है कि इस आयोजन से आदिवासी संस्कृति को देश-विदेश तक पहुंचाने में मदद मिलेगी। बस्तर पंडुम के तहत आदिवासी नृत्य, गीत, वाद्ययंत्र, पारंपरिक वेशभूषा, शिल्प, चित्रकला और व्यंजनों से जुड़ी प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही हैं।

बस्तर पंडुम तीन चरणों में हो रहा है:

जनपद स्तरीय स्पर्धा: 12 से 20 मार्च

जिला स्तरीय स्पर्धा: 21 से 23 मार्च

संभाग स्तरीय स्पर्धा (दंतेवाड़ा): 1 से 3 अप्रैल

हालांकि, आदिवासी समाज का कहना है कि अगर इस आयोजन में उनकी परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं को नजरअंदाज किया जाता रहा, तो इसका विरोध और तेज होगा। अब देखना यह होगा कि सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है।


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