फैमिली कोर्ट के फैसले पर हाईकोर्ट की मुहर, ठोस प्रमाण नहीं पेश कर सका पति: बिलासपुर: राज्य के एक कपड़ा व्यापारी द्वारा पत्नी को मानसिक रूप...
फैमिली कोर्ट के फैसले पर हाईकोर्ट की मुहर, ठोस प्रमाण नहीं पेश कर सका पति:
बिलासपुर: राज्य के एक कपड़ा व्यापारी द्वारा पत्नी को मानसिक रूप से बीमार बताकर तलाक की मांग करना उसे भारी पड़ गया। फैमिली कोर्ट से राहत न मिलने के बाद व्यापारी ने हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन वहां भी उसे निराशा ही हाथ लगी।
हाईकोर्ट की जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की खंडपीठ ने व्यापारी की अपील को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि विवाह को शून्य घोषित करने के लिए ठोस प्रमाण जरूरी होते हैं, लेकिन अपीलकर्ता अपने दावे के समर्थन में कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका।
क्या है मामला?
कपड़ा व्यापारी पति ने अपनी पत्नी पर मानसिक रूप से अस्वस्थ होने का आरोप लगाते हुए तलाक की अर्जी दी थी। फैमिली कोर्ट ने सबूतों के अभाव में इस अर्जी को खारिज कर दिया था। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिली।
हाईकोर्ट ने साफ किया कि केवल आरोप लगाने भर से विवाह को शून्य नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि बिना किसी ठोस मेडिकल रिपोर्ट या अन्य प्रमाण के किसी व्यक्ति को मानसिक रूप से अस्वस्थ ठहराना अनुचित है।
कोर्ट का रुख
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि विवाह दो लोगों के बीच एक गंभीर बंधन होता है, जिसे समाप्त करने के लिए स्पष्ट और ठोस आधार होने चाहिए। यदि किसी पक्ष को साथी की मानसिक स्थिति पर संदेह है, तो इसे मेडिकल प्रमाणों के जरिए साबित किया जाना चाहिए, केवल आरोपों के आधार पर तलाक नहीं दिया जा सकता।
यह फैसला उन मामलों के लिए मिसाल बन सकता है, जहां एक पक्ष बिना ठोस सबूत के साथी पर मानसिक बीमारी का आरोप लगाकर विवाह समाप्त करने की कोशिश करता है।
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