Page Nav

HIDE

Grid

GRID_STYLE

Pages

Classic Header

{fbt_classic_header}

Top Ad

ब्रेकिंग :

latest

पोरा तिहार और AI का दौर: जब तकनीक सूचना दे, लोक अनुभव सिखाए

पोरा तिहार • लोक • संस्कृति • AI लोक, अनुभव और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के समय में मनुष्य पोरा तिहार...

पोरा तिहार • लोक • संस्कृति • AI

लोक, अनुभव और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के समय में मनुष्य

पोरा तिहार की प्रासंगिकता : जब तकनीक सूचना दे रही है, तब लोक हमें अनुभव और स्मृति का अर्थ समझाता है
डॉ. रूपेंद्र कवि
डॉ. रूपेंद्र कवि
Anthropologist | Literature | Philanthropist
Deputy Secretary to the Governor, Chhattisgarh
आज छत्तीसगढ़ में पोरा तिहार है। गांवों में बैलों को सजाया जाएगा, उनकी पूजा होगी, घर-आंगन में उत्सव का वातावरण होगा और बच्चों के हाथों में मिट्टी के बैल दिखाई देंगे।

बाहर से देखने पर यह एक पारंपरिक कृषि-पर्व है, लेकिन मानवशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो इसके भीतर मनुष्य, पशु, प्रकृति, श्रम और समुदाय के बीच संबंधों की एक लंबी सांस्कृतिक स्मृति दिखाई देती है।

आज इस पर्व को समझने का हमारा तरीका भी बदल गया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में पोरा के इतिहास, उसकी परंपराओं और उसके सांस्कृतिक महत्व के बारे में कुछ ही क्षणों में विस्तृत जानकारी प्राप्त की जा सकती है। एक प्रश्न पूछिए और कुछ सेकंड में उत्तर सामने है।

लेकिन यहीं एक महत्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेता है—क्या किसी परंपरा के बारे में जानकारी प्राप्त कर लेना, उस परंपरा को समझ लेना भी है?

मेरे विचार से इसका उत्तर 'नहीं' है।

मानवशास्त्र हमें बताता है कि संस्कृति केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं होती। संस्कृति मनुष्य के जीवित अनुभवों की संरचना है। इसमें स्मृति, भाषा, विश्वास, श्रम, पर्यावरण, रिश्ते, व्यवहार और सामुदायिक जीवन एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।

इसीलिए पोरा तिहार को केवल 'बैल पूजा का त्योहार' कहना उसके अर्थ को बहुत छोटा कर देना होगा। कृषि-आधारित समाज में बैल केवल पशु नहीं था। वह खेत के श्रम का साथी था, परिवार की अर्थव्यवस्था का हिस्सा था और ग्रामीण जीवन की उत्पादन-व्यवस्था से सीधे जुड़ा था। पोरा उस संबंध को एक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और सामूहिक सम्मान में बदल देता है।

लोक का वास्तविक महत्व

यहां लोक का वास्तविक महत्व सामने आता है।

लोक वह ज्ञान है जो हमेशा किताबों में नहीं मिलता। किसी किसान को मौसम के बदलते संकेतों का वर्षों का अनुभव हो सकता है। किसी बुजुर्ग को किसी स्थानीय परंपरा की ऐसी कथा मालूम हो सकती है जो कभी लिखी ही नहीं गई। किसी लोकगीत की एक पंक्ति में उस समुदाय का ऐसा सामाजिक अनुभव छिपा हो सकता है, जिसे किसी औपचारिक दस्तावेज में ढूंढना कठिन हो।

यह अनुभवजन्य ज्ञान है—जीवन से पैदा हुआ, व्यवहार में परखा गया और पीढ़ियों के बीच हस्तांतरित हुआ ज्ञान।

AI : लोक-संस्कृति का सहयोगी, विकल्प नहीं

आज AI इस ज्ञान के दस्तावेजीकरण में हमारी बहुत मदद कर सकता है। लोकगीतों और लोककथाओं को डिजिटल रूप दिया जा सकता है। स्थानीय बोलियों और मौखिक इतिहासों को संरक्षित किया जा सकता है। दुर्लभ सांस्कृतिक सामग्री आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाई जा सकती है। इस अर्थ में तकनीक लोक-संस्कृति की बड़ी सहयोगी बन सकती है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है— किसी संस्कृति का डिजिटल रिकॉर्ड और स्वयं जीवित संस्कृति एक ही चीज नहीं हैं।

हम किसी लोकगीत को रिकॉर्ड कर सकते हैं, लेकिन उस गीत को गाने वाले समुदाय के अनुभव को रिकॉर्डिंग में पूरी तरह नहीं समेट सकते। हम पोरा की सभी विधियां लिख सकते हैं, लेकिन उस बुजुर्ग किसान की आंखों में अपने बैल के प्रति जो आत्मीयता है, उसे केवल शब्दों या डेटा में नहीं बदला जा सकता।

संस्कृति का अर्थ केवल यह नहीं कि क्या किया जाता है। उसका अर्थ यह भी है कि क्यों किया जाता है, किसके साथ किया जाता है और उस कार्य का समुदाय के लिए क्या अर्थ है।

सूचना, ज्ञान और अनुभव

आज हम एक ऐसे समय में हैं, जहां उत्तर प्राप्त करना पहले से कहीं अधिक आसान हो गया है। लेकिन ज्ञान और सूचना समानार्थी नहीं हैं। सूचना हमें किसी विषय के बारे में बता सकती है; ज्ञान हमें उसे समझने में सहायता करता है; और अनुभव कई बार उस समझ को जीवन का हिस्सा बनाता है।

इसलिए यह चिंता भी विचारणीय है कि यदि हम हर प्रश्न का उत्तर तुरंत मशीन से लेने लगें, तो कहीं हमारी अपनी जिज्ञासा, निरीक्षण और मौलिक चिंतन की प्रक्रिया कमजोर न पड़ जाए।

मनुष्य केवल उत्तरों से नहीं सीखता। वह प्रश्न करता है, गलती करता है, अनुभव करता है, तुलना करता है, दूसरों से संवाद करता है और फिर अपना निष्कर्ष बनाता है।

मौलिक विचार की जड़ें अक्सर इसी प्रक्रिया में होती हैं।

तकनीक और परंपरा के बीच संवाद

इसका अर्थ AI का विरोध करना नहीं है। बल्कि इसके विपरीत, हमें AI का उपयोग अधिक विवेकपूर्ण ढंग से करना होगा। मशीन से जानकारी लेना बुद्धिमानी है; लेकिन मशीन को अपने अनुभव और विवेक का विकल्प बना देना बुद्धिमानी नहीं।

हमें दोनों संसारों के बीच एक सार्थक संवाद बनाना होगा।

  • AI से हम पोरा के बारे में जानें, लेकिन अपने गांव के बुजुर्ग से यह भी पूछें कि उनके बचपन में पोरा कैसे मनाया जाता था।
  • लोकगीत का डिजिटल संग्रह बनाएं, लेकिन उसे गाने वाली पीढ़ी के साथ बैठकर उसका अर्थ भी समझें।
  • स्थानीय कृषि-ज्ञान का दस्तावेजीकरण करें, लेकिन उस ज्ञान को पैदा करने वाले किसान को केवल 'डेटा का स्रोत' न मानें।

लोक का भविष्य : अतीत से आगे

दरअसल, ग्रामीण भारत के लोक को बचाना केवल अतीत को बचाना नहीं है। यह भविष्य के लिए विविध ज्ञान-प्रणालियों को सुरक्षित रखना भी है। आधुनिक विज्ञान और स्थानीय अनुभव के बीच संवाद से पर्यावरण, कृषि, जल, जैव-विविधता और सामुदायिक जीवन के अनेक प्रश्नों को नए ढंग से समझा जा सकता है।

लोक स्थिर भी नहीं है। वह समय के साथ बदलता है। नई परिस्थितियों को स्वीकार करता है, पुराने तत्वों को नए अर्थ देता है और समाज के बदलने के साथ स्वयं भी बदलता है।

इसलिए लोक-संस्कृति को संग्रहालय में रखी वस्तु की तरह बचाने के बजाय उसे जीवित और संवादशील परंपरा के रूप में समझना चाहिए।

पोरा तिहार का आज के समय में संदेश

पोरा तिहार का संदेश इसी कारण आज भी प्रासंगिक है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य की सभ्यता केवल तकनीकी उपलब्धियों से नहीं बनी। वह उन संबंधों से भी बनी है जिन्हें मनुष्य ने भूमि, जल, पशु, प्रकृति और समुदाय के साथ विकसित किया।

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारे ज्ञान की सीमाओं को विस्तार दे रही है। यह मानव इतिहास की महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धियों में से एक है। लेकिन जितनी तेजी से मशीनें सीख रही हैं, उतनी ही गंभीरता से मनुष्य को यह भी तय करना होगा कि वह स्वयं क्या नहीं भूलना चाहता।

हमें अपनी भाषाएं नहीं भूलनी हैं।

अपनी लोकस्मृतियां नहीं भूलनी हैं।

अपने बुजुर्गों का अनुभव नहीं भूलना है।

और सबसे बढ़कर—अपने अनुभव से सोचने और प्रश्न करने की क्षमता नहीं भूलनी है।

पोरा तिहार के बहाने यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है कि आने वाली पीढ़ी को हम केवल अपनी संस्कृति की जानकारी न दें, बल्कि उसकी अनुभूति और अर्थ से भी जोड़ें।

क्योंकि भविष्य केवल उस समाज का नहीं होगा जिसके पास सबसे शक्तिशाली तकनीक होगी। भविष्य उस समाज का भी होगा जो अपनी स्मृति, संवेदना और विवेक को तकनीक के साथ लेकर आगे बढ़ सकेगा।

AI हमारी जानकारी का विस्तार कर सकता है; लोक हमारे अनुभव की गहराई को सुरक्षित रखता है।

और शायद यही पोरा तिहार की आज के समय में सबसे बड़ी प्रासंगिकता है— यह हमें स्मरण कराता है कि तकनीक चाहे कितनी भी विकसित हो जाए, मनुष्य की वास्तविक समृद्धि केवल उसके पास उपलब्ध जानकारी में नहीं, बल्कि उसके जीवित अनुभव, सामुदायिक स्मृति और विवेक में भी निहित है।

लोक को केवल जानना नहीं होता।

लोक को जीना पड़ता है।

डॉ. रूपेंद्र कवि
Anthropologist | Literature | Philanthropist
Deputy Secretary to the Governor, Chhattisgarh
अस्वीकरण: यह लेख लेखक के व्यक्तिगत एवं स्वतंत्र विचारों की अभिव्यक्ति है। इसमें व्यक्त विचार किसी भी प्रकार से राजभवन, राज्यपाल अथवा छत्तीसगढ़ शासन के आधिकारिक विचार या वक्तव्य का प्रतिनिधित्व नहीं करते।

कोई टिप्पणी नहीं

Girl in a jacket