आज ‘हिंदी राजभाषा दिवस’ के इस अवसर पर जब हम राजभाषा के सफर का सिंहावलोकन करते हैं, तो भाषा की वास्तविक स्थिति और इसकी प्रासंगिकता के कई नए आयाम सामने आते हैं। आज का युग सूचना प्रौद्योगिकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का युग है। तकनीकी क्रांति के इस दौर में भाषा की परिभाषा और उसकी स्वीकार्यता के प्रतिमान तेजी से बदले हैं। जब AI के माध्यम से किसी भी भाषा, बोली या विचार को क्षण भर में टाइप करके स्क्रीन पर हुबहू उतार दिया जाता है, तब भाषा का भाषाई और व्यावहारिक मूल्यांकन करना और भी जरूरी हो जाता है।

डिजिटल स्क्रीन पर सिमटती इस दुनिया में हिंदी की वास्तविक वैश्विक स्थिति का निष्पक्ष विश्लेषण आज के समय की सबसे बड़ी मांग है। एक मानवशास्त्री और साहित्यकार के दृष्टिकोण से, भाषा केवल संवाद का साधन नहीं है, बल्कि वह किसी भी समाज की संस्कृति, लोक-चेतना और उसकी ऐतिहासिक अस्मिता की संवाहक होती है।

हिंदी ने देश को प्रशासनिक और सांस्कृतिक रूप से जोड़ने में एक सेतु की भूमिका निभाई है। परंतु, जब हम हिंदी को पूर्णतः (100 प्रतिशत) स्थापित करने की बात करते हैं, तो हमें इसके साथ पनपने वाली आंचलिक बोलियों और क्षेत्रीय भाषाओं के सह-अस्तित्व को भी उतनी ही गंभीरता से स्वीकार करना होगा।

भाषा का विकास ‘एकछत्र राज’ से नहीं, बल्कि ‘सह-अस्तित्व’ से होता है।

यदि हम छत्तीसगढ़ के भाषाई परिदृश्य को देखें, तो यहाँ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत इसकी बोलियों और भाषाओं में बसती है। बस्तर की ‘हल्बी बोली’ इसका एक जीवंत उदाहरण है, जो अपने भीतर एक अनूठी जनजातीय संस्कृति और इतिहास को समेटे हुए है।

हल्बी जैसी समृद्ध बोलियाँ हमारी जड़ों को सींचती हैं। इसी भाषाई अस्मिता को अक्षुण्ण रखने के लिए आज छत्तीसगढ़ के लोग ‘छत्तीसगढ़ी भाषा’ को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। यह प्रयास किसी अन्य भाषा के विरोध में नहीं, बल्कि अपनी भाषाई अस्मिता और लोक-संस्कृति के संरक्षण के लिए एक आवश्यक और तार्किक कदम है।

हिंदी तभी सशक्त होगी, जब वह समावेशी होगी

वास्तविक प्रगति तब मानी जाएगी जब राष्ट्रभाषा या राजभाषा के रूप में हिंदी इतनी सुदृढ़ और व्यापक हो जाए कि वह देश की अन्य क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों के लिए एक ‘बहिष्करण का औजार’ बनने के बजाय उनकी संरक्षक बने।

जब हिंदी पूर्णतः स्थापित हो, तब देश की हर क्षेत्रीय भाषा और बोली को भी फलने-फूलने का पूरा अधिकार और सम्मान मिलना चाहिए। भाषा का विकास ‘एकछत्र राज’ से नहीं बल्कि ‘सह-अस्तित्व’ से होता है।

AI के दौर में भाषा की नई चुनौती

डिजिटल और AI के इस दौर में जहाँ अनुवाद और अभिव्यक्ति के तकनीकी रास्ते सुगम हुए हैं, वहीं भाषाई संवेदना और मौलिकता को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती है।

राजभाषा दिवस की सार्थकता केवल औपचारिक आयोजनों या आंकड़ों की बाजीगरी में नहीं है। इसकी वास्तविक प्रासंगिकता इस बात में है कि हम तकनीकी रूप से सक्षम होते हुए भी अपनी जड़ों—जैसे बस्तर की हल्बी या छत्तीसगढ़ी—से जुड़े रहें और हिंदी को एक समावेशी भाषा के रूप में विकसित करें, जो हर भारतीय को अपनी भाषा लगे।

आइए, आज के दिन हम भाषा को रूढ़िवादिता से मुक्त कर उसे आधुनिक, व्यावहारिक और संवेदनशील बनाने का संकल्प लें।

लेखक परिचय

डॉ. रूपेन्द्र कवि छत्तीसगढ़ शासन के संवैधानिक प्रकोष्ठ में उप सचिव हैं। आप एक मानवशास्त्री, साहित्यकार एवं परोपकारी हैं, जिनकी हिंदी के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी/बस्तर की ‘हल्बी बोली’ और आंचलिक लोक-संस्कृति के संरक्षण में गहरी रुचि है।

अस्वीकरण: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत और अकादमिक दृष्टिकोण पर आधारित हैं। यह कोई आधिकारिक आलेख नहीं है और न ही यह लेखक के शासकीय पद या विभाग के आधिकारिक रुख को प्रदर्शित करता है।