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नदी पर पुल नहीं, उफनते नाले को पार कर जान जोखिम में डाल रहे ग्रामीण

• धुरली-मुलसनार के बीच 7-8 साल से अधूरा पड़ा पुल, माओवादी घटना के बाद बंद हुआ निर्माण कार्य अब तक शुरू नहीं : दंतेवाड़ा (बचेली) : विकास के ...

धुरली-मुलसनार के बीच 7-8 साल से अधूरा पड़ा पुल, माओवादी घटना के बाद बंद हुआ निर्माण कार्य अब तक शुरू नहीं :

दंतेवाड़ा (बचेली) : विकास के दावों के बीच मुलसनार और आसपास के गांवों के ग्रामीण आज भी एक सुरक्षित पुल के अभाव में उफनती नदी पार करने को मजबूर हैं। धुरली और मुलसनार के बेरमा गांव के बीच बहने वाली बड़ा नाला नदी पर पुल निर्माण अधूरा पड़ा है, जिसके कारण बारिश के मौसम में ग्रामीणों की परेशानी और खतरा दोनों बढ़ जाते हैं।

मुलसनार सहित आसपास के कई गांवों के लोगों को राशन, इलाज, बाजार और अन्य जरूरी कामों के लिए धुरली जाना पड़ता है। नदी में पानी बढ़ने और तेज बहाव के बावजूद उनके पास आने-जाने का कोई सुरक्षित विकल्प नहीं है। ग्रामीणों को पैदल नदी पार करनी पड़ती है। यहां तक कि किसी की मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार के लिए भी लोगों को इसी रास्ते से होकर धुरली पहुंचना पड़ता है।

ग्रामीणों के अनुसार करीब 7-8 वर्ष पहले बड़ा नाला नदी पर पुल निर्माण का काम शुरू किया गया था। इस दौरान माओवादी घटना में निर्माण कार्य में लगी मशीनरी को आग के हवाले कर दिया गया, जिसके बाद निर्माण कार्य बंद हो गया। बाद में निर्माण कार्य को नुकसान पहुंचाए जाने की घटनाओं की भी जानकारी सामने आई। हालांकि वर्षों बीत जाने के बाद भी अधूरे पुल का निर्माण दोबारा शुरू नहीं हो सका।

बारिश के दिनों में हालात सबसे ज्यादा गंभीर हो जाते हैं। नदी का बहाव तेज होने पर ग्रामीणों को जान जोखिम में डालकर उसे पार करना पड़ता है। कई ग्रामीण अपनी बाइक नदी के इस पार धुरली में ही खड़ी कर देते हैं और उसे झिल्ली से ढककर पैदल नदी पार कर गांव पहुंचते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि पुल निर्माण को लेकर कई बार शासन-प्रशासन को जानकारी दी गई है, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकला है। उनका सवाल है कि वर्षों से अधूरा पड़ा पुल आखिर कब पूरा होगा और क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही प्रशासन इस समस्या को गंभीरता से लेगा।

ग्रामीणों ने बड़ा नाला नदी पर अधूरे पड़े पुल का निर्माण तत्काल शुरू कराने की मांग की है, ताकि मुलसनार और आसपास के गांवों के लोगों को बारिश के दौरान अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार न करनी पड़े।

(साभार : नवीन चौधरी (बचेली))


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