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लखपति दीदी: आत्मनिर्भरता की राह पर छत्तीसगढ़ की महिलाएँ

लखपति दीदी: आत्मनिर्भरता की राह पर छत्तीसगढ़ की महिलाएँ 8 मार्च | International Women's Day विशेष लेख 8 मार्च...

लखपति दीदी: आत्मनिर्भरता की राह पर छत्तीसगढ़ की महिलाएँ

8 मार्च यानी International Women's Day केवल महिलाओं के सम्मान का दिन नहीं, बल्कि उनकी आर्थिक भागीदारी और आत्मनिर्भरता पर गंभीर चिंतन का अवसर भी है। आज ग्रामीण भारत में महिला सशक्तिकरण की जिस नई तस्वीर की चर्चा हो रही है, उसमें “लखपति दीदी” अभियान एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है। छत्तीसगढ़ में भी यह प्रयास ग्रामीण महिलाओं की आय बढ़ाने और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यह पहल मूलतः Deendayal Antyodaya Yojana – National Rural Livelihoods Mission से जुड़ी है, जिसके तहत स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को संगठित कर स्वरोज़गार और उद्यमिता के अवसर दिए जाते हैं। इसका उद्देश्य यह है कि ग्रामीण महिलाएँ सालाना कम से कम एक लाख रुपये की आय अर्जित कर सकें और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनें।

छत्तीसगढ़ में इस अभियान का आधार स्वयं सहायता समूहों का विस्तृत नेटवर्क है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार राज्य में लाखों महिलाएँ स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर कृषि, पशुपालन, लघु उद्योग, वन उत्पाद प्रसंस्करण और सेवा क्षेत्र जैसे विविध कार्यों में सक्रिय हैं। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप अनेक महिलाएँ अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि करने में सफल हुई हैं और “लखपति दीदी” की अवधारणा को व्यवहार में साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में यह परिवर्तन केवल आय तक सीमित नहीं है। कई क्षेत्रों में महिलाएँ मशरूम उत्पादन, बकरी पालन, मधुमक्खी पालन, सिलाई-कढ़ाई, पोषण आहार निर्माण और स्थानीय उत्पादों के विपणन जैसे कार्यों से जुड़कर उद्यमिता की नई मिसाल प्रस्तुत कर रही हैं। आदिवासी अंचलों में भी वन उत्पादों के संग्रह और प्रसंस्करण के माध्यम से महिलाओं के लिए आय के नए अवसर बन रहे हैं।

मानवशास्त्रीय दृष्टि से देखा जाए तो ग्रामीण समाज में महिलाओं की आर्थिक भूमिका जितनी मजबूत होती है, सामाजिक निर्णय-प्रक्रिया में उनकी भागीदारी भी उतनी ही बढ़ती है। जब महिलाएँ आर्थिक रूप से सशक्त होती हैं तो उसका सकारात्मक प्रभाव पूरे परिवार और समुदाय पर पड़ता है—बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर में सुधार दिखाई देता है। इस दृष्टि से महिला सशक्तिकरण केवल सामाजिक न्याय का प्रश्न नहीं बल्कि समग्र ग्रामीण विकास का आधार भी है।

हालाँकि, इस पहल की वास्तविक सफलता उसके स्थायी और व्यापक प्रभाव से तय होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षण के साथ-साथ उत्पादों के लिए स्थायी बाज़ार, वित्तीय संस्थाओं तक सरल पहुँच और तकनीकी मार्गदर्शन की आवश्यकता बनी रहती है। यदि इन पहलुओं पर निरंतर ध्यान दिया जाए, तो यह पहल न केवल महिलाओं की आय बढ़ाने में सहायक होगी बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई गति प्रदान कर सकती है।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की ऐसी पहलें निरंतर आगे बढ़ें और अधिकाधिक ग्रामीण महिलाओं तक पहुँचें। यदि सामुदायिक भागीदारी, प्रशिक्षण और बाज़ार समर्थन को मजबूत किया जाए तो आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की महिलाएँ आत्मनिर्भरता और विकास की एक सशक्त मिसाल बन सकती हैं।

डॉ. रुपेन्द्र कवि
एंथ्रोपोलॉजिस्ट, साहित्यकार एवं परोपकारी Deputy Secretary to Governor, Chhattisgarh
अस्वीकरण: यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। इसका किसी भी सरकारी कार्यालय, विभाग या पद से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं माना जाना चाहिए।

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