बस्तर पाण्डुम: सांस्कृतिक नीति, जनजातीय सहभागिता और बस्तर का समकालीन विमर्श बस्तर पाण्डुम: सांस्कृतिक नीति, जनजातीय सहभागिता ...
बस्तर पाण्डुम: सांस्कृतिक नीति, जनजातीय सहभागिता और बस्तर का समकालीन विमर्श
बस्तर पाण्डुम 2026 छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में आयोजित एक ऐसा सांस्कृतिक आयोजन है, जो जनजातीय समाज की जीवंत परंपराओं, लोककला, नृत्य-संगीत और सामुदायिक जीवन-दृष्टि को समकालीन संदर्भ में प्रस्तुत करता है। यह आयोजन केवल उत्सव भर नहीं, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक आत्मसम्मान के पुनर्पाठ का अवसर भी है।
इस वर्ष बस्तर पाण्डुम का आयोजन बस्तर संभाग के विभिन्न जिलों में चरणबद्ध रूप से किया गया—ग्राम पंचायत, जनपद/जिला और अंततः संभागीय स्तर तक। इस व्यापक ढाँचे ने स्थानीय कलाकारों और समुदायों को अपनी परंपराओं को स्वयं प्रस्तुत करने का मंच दिया। नीति और मानवविज्ञान—दोनों दृष्टियों से यह उल्लेखनीय है कि इस आयोजन में सहभागिता और प्रतिनिधित्व को केंद्रीय तत्व के रूप में रखा गया।
बस्तर जैसे क्षेत्रों में विकास विमर्श लंबे समय से जटिल रहा है। ऐसे में सांस्कृतिक पहलें एक सॉफ्ट पॉलिसी टूल की भूमिका निभा सकती हैं, जो राज्य और समाज के बीच विश्वास का सेतु बनें। आवश्यक है कि इन आयोजनों से प्राप्त अनुभवों को शिक्षा, शोध, स्थानीय आजीविका और सांस्कृतिक दस्तावेज़ीकरण से भी जोड़ा जाए, ताकि इनका प्रभाव दीर्घकालिक हो।
राष्ट्रपति का बस्तर आगमन और इसके पश्चात 9 फरवरी को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह द्वारा बस्तर पाण्डुम का समापन इस आयोजन को राष्ट्रीय स्तर के विमर्श से जोड़ता है। इसे एक औपचारिक कार्यक्रम भर न मानकर, जनजातीय क्षेत्रों के प्रति संवाद और नीति-संवेदनशीलता के अवसर के रूप में देखे जाने की आवश्यकता है।
अंततः, बस्तर पाण्डुम जैसे आयोजन न तो अपने आप में अंतिम समाधान हैं और न ही मात्र सांस्कृतिक प्रदर्शन। वे एक संभावना हैं—संवाद की, सहभागिता की और जनजातीय अस्मिता को समकालीन भारत के व्यापक सामाजिक-नीतिगत परिदृश्य में सम्मानपूर्वक स्थापित करने की।
यह लेख लेखक के व्यक्तिगत, अकादमिक एवं शोधपरक दृष्टिकोण पर आधारित है। इसका किसी भी प्रकार से राजभवन, राज्य सरकार अथवा किसी संवैधानिक पद या संस्था के आधिकारिक मत या नीति से कोई संबंध नहीं है।

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