विशेष लेख : भारत विविधताओं का देश है। भारत देश में एक नीले आसमान के नीचे कई समृद्ध संस्कृतियाँ फल-फूल रही हैं। भारत की अनेकताओं में कुछ त्यौ...
विशेष लेख : भारत विविधताओं का देश है। भारत देश में एक नीले आसमान के नीचे कई समृद्ध संस्कृतियाँ फल-फूल रही हैं। भारत की अनेकताओं में कुछ त्यौहार ऐसे हैं, जो सारे देश को एक साथ जोड़ते हैं। छत्तीसगढ़ संस्कृति में त्यौहारों, पर्वों का विशेष महत्व है। इन त्यौहारों के क्रम में पहला त्यौहार हरेली का है। इसीलिए कहा गया—छत्तीसगढ़ संस्कृति परंपरा का त्यौहार हरेली। हरेली त्यौहार को श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या में मनाया जाता है। यह त्यौहार किसानों और सभी छत्तीसगढ़वासियों का त्यौहार है। हरेली का अर्थ प्रकृति के चारों ओर हरियाली से है। किसान खेत में जुताई, बोआई, रोपाई, बियासी के कार्य पूर्ण करके इस त्यौहार को मनाते हैं।
हरेली त्यौहार की जड़ें छत्तीसगढ़ की समृद्ध कृषि विरासत में हैं, जहाँ इसे लंबे समय से कृषि देवताओं के प्रति सम्मान के रूप में मनाया जाता रहा है। मानसून की शुरुआत में मनाया जाने वाला हरेली, बुवाई के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है और लोगों तथा उनकी ज़मीन के बीच गहरे बंधन को दर्शाता है। पीढ़ियों से चला आ रहा यह त्यौहार पारंपरिक रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों को कायम रखता है, और इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है।
• प्रकृति की पूजा का विधान :
हरेली मनुष्य और प्रकृति के बीच गहरे संबंध का प्रतीक है, जो ज़मीन और जीवन को सहारा देने वाले औजारों के प्रति कृतज्ञता की भावना को उजागर करता है। परंपरागत रूप से इस त्यौहार को सांप्रदायिक संबंधों को मज़बूत करने और कृषि एवं प्राकृतिक दुनिया की देखरेख करने वाली दिव्य शक्तियों का सम्मान करने के एक तरीके के रूप में देखा जाता है। सावन माह की अमावस्या पर होने वाले हरेली त्यौहार को वर्ष का पहला त्यौहार माना जाता है। लगातार बारिश से खेतों की शुरुआती जुताई-रोपाई का काम होने पर, खेतों में हरियाली बरकरार रखने के लिए यह त्यौहार मनाया जाता है।
• कृषि औजारों की पूजा :
छत्तीसगढ़ के किसान हरेली त्यौहार के दिन गाय, बैल, भैंस को साफ-सुथरा कर नहलाते हैं। अपनी खेती में काम आने वाले औजारों जैसे हल (नांगर), कुदाली, फावड़ा, गैंती को धोकर घर के आंगन में रख दिया जाता है या आंगन के किसी कोने में मुरूम बिछाकर पूजा के लिए सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। साथ ही अपने कुलदेवता की भी पूजा की जाती है।
• घरों में आराध्य देवी-देवताओं की पूजा, घर-घर बनते पकवान :
माताएँ गुड़ का चीला बनाती हैं और कृषि औजारों को धूप-दीप से पूजन के बाद नारियल, गुड़ के चीला का भोग अर्पित करती हैं। अपने-अपने घरों में आराध्य देवी-देवताओं के साथ पूजा करते हैं। हरेली के दिन बच्चे गेड़ी का आनंद लेते हैं। इस अवसर पर सभी घरों में विशेष प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं। चावल के आटे से बनी चीला रोटी इस दिन चाव से खाई जाती है। कोई इसे नमकीन बनाता है, तो कोई मीठा भी। यह खाने वालों की पसंद पर निर्भर करता है। इस तरह यह त्यौहार परंपराओं से भरा हुआ होता है।
हरेली त्यौहार के दिन सभी लोग अपने-अपने दरवाज़े पर नीम की टहनी तोड़कर टांग देते हैं और गेड़ी खेल का आयोजन शुरू हो जाता है। हरेली तिहार के दिन सुबह से ही बच्चे से लेकर युवा तक 20 से 25 फीट ऊँची गेड़ी बनाते हैं। उसी दिन सभी युवा एवं बच्चे गेड़ी चढ़ते हैं और गाँव में घूमते हैं। बच्चों और युवाओं के बीच गेड़ी दौड़ प्रतियोगिता भी होती है।
• अनिष्ट की रक्षा का पर्व :
हरेली तिहार के दिन पूजा करने से पर्यावरण शुद्ध और सुरक्षित रहता है और फसल उगती है तो किसी भी प्रकार की बीमारी नहीं लगती। हरेली तिहार मनाने से फसल को हानिकारक कीट तथा अनेक बीमारियाँ नहीं होतीं, इसीलिए हरेली तिहार मनाया जाता है। हरेली त्यौहार के दौरान छत्तीसगढ़ के लोग अपने-अपने खेतों में भेलवा पेड़ की शाखाएँ लगाते हैं। वे अपने घरों के प्रवेश द्वार पर नीम के पेड़ की शाखाएँ भी लगाते हैं। नीम में औषधीय गुण होते हैं, जो बीमारियों के साथ-साथ कीड़ों को भी रोकते हैं। लोहार हर घर के मुख्य द्वार पर नीम की पत्ती लगाकर और चौखट में कील ठोंककर आशीर्वाद देते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से उस घर में रहने वालों की अनिष्ट से रक्षा होती है।
हरेली पर्व में गाँव और शहरों में नारियल फेंक प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। सुबह पूजा-अर्चना के बाद गाँव के चौक-चौराहों पर युवाओं की टोली एकत्र होती है और नारियल फेंक प्रतियोगिता खेली जाती है। इस प्रतियोगिता में लोग नारियल को फेंककर दूरी का मापन करते हैं। नारियल हारने और जीतने का सिलसिला रात देर तक चलता है और यह एक रंगीन और आनंदमय गतिविधि होती है।
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• हरेली त्योहार पर लिखी गई कविता :
हरेली के रंग, छत्तीसगढ़ के संग
हरे-भरे खेत, हरियाली छाई,
आज हरेली, खुशियाँ लाई।
किसानों का त्यौहार, प्रकृति का उपहार,
नांगर, गैंती, कुदाली, सबकी पूजा आज निराली।
पशुधन भी पूजे जाते, गौ माता को भोग लगाते।
गुड़ का चीला, ठेठरी-खुरमी, मिठाई का स्वाद घर-घर घूमी।
खुशियों से आंगन महके, मन में उमंग सबके।
जड़ी-बूटी का लेप, बीमारी भागे, मिले सुख-चैन।
हरेली के रंग, छत्तीसगढ़ के संग।
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लेखक :
धनंजय राठौर
(संयुक्त संचालक)
जनसंपर्क संचालनालय, रायपुर
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