आदिवासी पुतलों के सिर गायब, खंडहर में बदले घरों के मॉडल, सूख चुका कृत्रिम झरना: नवा रायपुर : छत्तीसगढ़ की संस्कृति और परंपराओं को जीवंत रूप...
आदिवासी पुतलों के सिर गायब, खंडहर में बदले घरों के मॉडल, सूख चुका कृत्रिम झरना:
नवा रायपुर : छत्तीसगढ़ की संस्कृति और परंपराओं को जीवंत रूप में प्रदर्शित करने के लिए निर्मित पुरखौती मुक्तांगन खुद बदहाली की तस्वीर बन गया है। यह स्थल, जिसे 2006 में सांस्कृतिक धरोहर के रूप में विकसित किया गया था, अब उपेक्षा का शिकार हो चुका है।
संस्कृति को करीब से समझने के लिए बनाए गए आदिवासी पुतले या तो सिर विहीन हो चुके हैं या जर्जर अवस्था में हैं। उनके पारंपरिक घरों के मॉडल खंडहर में तब्दील हो गए हैं। वहीं, कृत्रिम झरना, जो कभी इस स्थान की खूबसूरती बढ़ाता था, महीनों से सूखा पड़ा है।
संस्कृति के प्रतीक लापता, रखरखाव पर सवाल:
पुरखौती मुक्तांगन का पहला चरण 2006 में, दूसरा चरण 2012-13 में और तीसरा चरण अंबिकापुर सेक्टर के रूप में प्रस्तावित था। मगर मौजूदा स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि रखरखाव की घोर अनदेखी की गई है।
स्थानीय लोगों और पर्यटकों के अनुसार, व्यवस्था की लापरवाही के चलते यह ऐतिहासिक स्थल उजाड़ होता जा रहा है। रखरखाव के अभाव में यहां की कलाकृतियां नष्ट हो रही हैं, मूर्तियां खंडित हो चुकी हैं और सांस्कृतिक विरासत की चमक फीकी पड़ गई है।
क्या कहती है प्रशासन की जिम्मेदारी?
यह सवाल उठता है कि जिस स्थान को छत्तीसगढ़ की संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित करने के लिए विकसित किया गया था, उसकी यह दयनीय स्थिति क्यों है? क्या प्रशासन इसकी जिम्मेदारी लेगा या यह धरोहर सिर्फ एक भूली-बिसरी कहानी बनकर रह जाएगी?
सरकार और संबंधित विभाग को तत्काल ध्यान देकर पुरखौती मुक्तांगन के पुनरुद्धार के लिए ठोस कदम उठाने होंगे, ताकि यह अपनी मूल पहचान को फिर से प्राप्त कर सके और छत्तीसगढ़ की संस्कृति का सही मायने में प्रतिनिधित्व कर सके।
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