आदि परब 2026 : जनजातीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक अस्मिता का सशक्त उत्सव आदि परब 2026 : जनजातीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक अ...
छत्तीसगढ़ जैसे जनजातीय बहुल राज्य में जनजातीय समाज की सांस्कृतिक परंपराओं, ज्ञान प्रणालियों और जीवन-दर्शन को समझना तथा संरक्षित करना केवल सांस्कृतिक दायित्व ही नहीं, बल्कि नीति और समाज दोनों के स्तर पर एक महत्वपूर्ण आवश्यकता भी है। इसी संदर्भ में नवा रायपुर स्थित आदिम जाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान परिसर में 13 और 14 मार्च को आयोजित ‘आदि परब 2026’ को एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक एवं बौद्धिक पहल के रूप में देखा जाना चाहिए।
आदिम जाति विकास विभाग द्वारा आयोजित यह उत्सव जनजातीय संस्कृति, कला और परंपराओं को व्यापक समाज के समक्ष प्रस्तुत करने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का अवसर प्रदान करता है। कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ की विभिन्न जनजातियों के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों से आए जनजातीय कलाकार अपनी लोक परंपराओं, पारंपरिक वेशभूषा, चित्रकला, लोकसंगीत और हस्तशिल्प के माध्यम से भारत की समृद्ध जनजातीय सांस्कृतिक विरासत की झलक प्रस्तुत करेंगे।
ऐसे आयोजनों का महत्व केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन तक सीमित नहीं होता। मानवशास्त्रीय और नीतिगत दृष्टि से देखें तो ये मंच जनजातीय समुदायों की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों, प्रकृति के साथ उनके संतुलित संबंध और सामुदायिक जीवन मूल्यों को समझने का अवसर प्रदान करते हैं। विशेष रूप से जल, जंगल और जमीन के साथ जनजातीय समाज के गहरे संबंध तथा उनकी पारंपरिक पारिस्थितिक समझ आज के वैश्विक पर्यावरणीय विमर्श में भी अत्यंत प्रासंगिक मानी जा रही है।
वर्तमान समय में जब वैश्वीकरण और तीव्र सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन पारंपरिक जीवन पद्धतियों को प्रभावित कर रहे हैं, तब ‘आदि परब’ जैसे आयोजन सांस्कृतिक निरंतरता और सामाजिक संवाद के महत्वपूर्ण माध्यम बनते हैं। यह मंच न केवल जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को सम्मान देता है, बल्कि नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और समाज के अन्य वर्गों को भी जनजातीय समाज की परंपराओं और ज्ञान प्रणाली को समझने का अवसर प्रदान करता है।
इस प्रकार ‘आदि परब 2026’ को केवल एक सांस्कृतिक उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि जनजातीय अस्मिता, सांस्कृतिक संरक्षण और समाज के विभिन्न वर्गों के बीच रचनात्मक संवाद को प्रोत्साहित करने वाली एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा सकता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहाँ जनजातीय समाज राज्य की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना का अभिन्न अंग है, ऐसे आयोजन समावेशी विकास और सांस्कृतिक संवेदनशीलता की दिशा में भी सार्थक भूमिका निभा सकते हैं।

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