युवाओं का सशक्तिकरण : स्वामी विवेकानंद का सशक्त भारत का मानववैज्ञानिक दृष्टिकोण युवाओं का सशक्तिकरण : स्वामी विवेकानंद का सश...
युवाओं का सशक्तिकरण : स्वामी विवेकानंद का सशक्त भारत का मानववैज्ञानिक दृष्टिकोण
भारत की सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक निरंतरता को समझने में युवा शक्ति की भूमिका केंद्रीय रही है। मानववैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो कोई भी राष्ट्र तब सशक्त बनता है, जब उसकी युवा पीढ़ी अपनी पहचान, मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व को लेकर सजग होती है। स्वामी विवेकानंद ने इस तथ्य को गहराई से समझते हुए युवाओं को भारतीय पुनर्जागरण की धुरी बनाया।
स्वामी विवेकानंद का चिंतन केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि गहराई से मानववैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय था। वे मानव व्यवहार, चेतना और संस्कृति के अंतर्संबंधों को भली-भांति समझते थे। उनका मानना था कि युवाओं का सशक्तिकरण केवल बाह्य संसाधनों से नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक बोध से संभव है। यही कारण है कि वे आत्मबल को सभी प्रकार की शक्ति का मूल मानते थे।
उनका प्रसिद्ध आह्वान— “उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक रुको मत”— केवल प्रेरक नारा नहीं, बल्कि युवा मनोविज्ञान की गहरी समझ को दर्शाता है। यह संदेश युवाओं में संकल्प, आत्म-नियंत्रण और उद्देश्यपरक जीवन की भावना विकसित करता है, जो किसी भी सशक्त समाज की आधारशिला है।
मानववैज्ञानिक दृष्टिकोण से शिक्षा को विवेकानंद ने सांस्कृतिक अंतरण (Cultural Transmission) का प्रमुख माध्यम माना। वे ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे जो व्यक्ति को उसकी सामाजिक जड़ों से जोड़े, उसके चरित्र का निर्माण करे और उसे समाज के प्रति उत्तरदायी नागरिक बनाए। उनके अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविकोपार्जन नहीं, बल्कि मानव निर्माण है।
स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति से जोड़ते हुए सेवा को सामाजिक विकास का नैतिक आधार बनाया। मानव विकास की किसी भी प्रक्रिया में यदि करुणा, समावेशन और समानता का अभाव हो, तो वह विकास अधूरा रह जाता है—यह दृष्टि उनके विचारों में स्पष्ट दिखाई देती है।
आज के दौर में, जब युवाओं के सामने पहचान का संकट, मानसिक दबाव और मूल्यगत भ्रम जैसी चुनौतियाँ हैं, विवेकानंद का मानववैज्ञानिक दृष्टिकोण एक मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है। संवेदनशील, आत्मविश्वासी और सांस्कृतिक रूप से जागरूक युवा ही भारत को वास्तविक अर्थों में सशक्त बना सकते हैं।
निष्कर्षतः, स्वामी विवेकानंद का सशक्त भारत का स्वप्न मानव चेतना, सामाजिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक निरंतरता पर आधारित है। यदि आज का युवा इस दृष्टि को आत्मसात करे, तो भारत न केवल भौतिक रूप से, बल्कि मानवीय मूल्यों में भी विश्वपथप्रदर्शक बन सकता है।

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