शुभांशु झा संपादक, 4thcolumn.in निदेशक, VBFC Welfare Foundation सीईओ, Global Vision IT Con...
जागरूक नागरिक ही लोकतंत्र की असली ताक़त है
लोकतंत्र केवल चुनावों से जीवित नहीं रहता, वह नागरिकों की चेतना से साँस लेता है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में यदि नागरिक अपने अधिकारों, कर्तव्यों और शासन-प्रशासन की बुनियादी समझ से वंचित हो, तो लोकतंत्र का स्वरूप केवल औपचारिक बनकर रह जाता है।
एक साधारण नागरिक से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह कानूनविद् या संविधान विशेषज्ञ हो, पर यह अपेक्षा अवश्य है कि वह इतना जानता हो कि उसके साथ अन्याय कब और कैसे हो रहा है—और उससे निपटने का रास्ता क्या है।
संविधान: नागरिक और सत्ता के बीच की रेखा
भारतीय संविधान नागरिक को केवल अधिकार नहीं देता, बल्कि राज्य की सीमाएँ भी तय करता है। मौलिक अधिकार—समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता—किसी सरकार की कृपा नहीं, बल्कि नागरिक का जन्मसिद्ध संरक्षण हैं।
इसी तरह, मौलिक कर्तव्य यह स्मरण कराते हैं कि स्वतंत्रता अराजकता नहीं है। संविधान, कानून, सार्वजनिक संपत्ति और सामाजिक सद्भाव का सम्मान नागरिकता की बुनियादी शर्त है।
कानून की जानकारी(न्यूनतम ही सही) : भय से मुक्ति का साधन
आज भी बड़ी संख्या में नागरिक केवल इसलिए डर जाते हैं क्योंकि उन्हें यह नहीं पता होता कि पुलिस की शक्तियों की भी संवैधानिक सीमाएँ हैं। बिना कारण गिरफ्तारी नहीं हो सकती, FIR दर्ज कराना अधिकार है, और हर गिरफ्तारी न्यायिक निगरानी के अधीन होती है।
कानून की यह न्यूनतम समझ नागरिक को अपराधी नहीं, बल्कि आत्मविश्वासी बनाती है।
प्रशासन: शासक नहीं, सेवक
लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकारी ‘मालिक’ नहीं, ‘लोकसेवक’ होते हैं। सूचना का अधिकार (RTI), लोक सेवा गारंटी कानून, जनसुनवाई और शिकायत तंत्र नागरिक को यही स्मरण कराते हैं कि प्रशासन जनता के प्रति उत्तरदायी है।
जब नागरिक प्रश्न करना सीखता है, तब व्यवस्था जवाबदेह बनती है।
मतदान से आगे की नागरिकता
वोट देना नागरिकता की शुरुआत है, अंत नहीं। प्रतिनिधियों से सवाल पूछना, नीतियों पर असहमति जताना, और शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराना—ये सभी लोकतंत्र के वैध उपकरण हैं।
डिजिटल युग की नई ज़िम्मेदारियाँ
आज अफवाहें उतनी ही खतरनाक हैं जितने हथियार। फेक न्यूज़, साइबर अपराध और ऑनलाइन घृणा नागरिक से विवेक और संयम की माँग करते हैं।
डिजिटल स्वतंत्रता तभी सुरक्षित है, जब डिजिटल जिम्मेदारी भी साथ चले।
अंततः
एक जागरूक नागरिक न तो व्यवस्था से डरता है, न उसे तोड़ने में विश्वास करता है। वह उसे समझता है, सुधारता है और मजबूत करता है।
भारत का भविष्य सड़कों पर लगे नारों में नहीं, बल्कि नागरिक की चेतना में आकार लेता है।

बहुत ही सुंदर लेख
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